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किताबों की दुनिया - राहुल अभुआ


 मैं बार-बार उन किताबों की ओर लौट जाना चाहता हूँ, जिन्हें मैं पढ़ चुका हूँ। अजीब है नई किताबें पास में पड़ी हैं लेकिन हाथ उन्हीं पुरानी, मुड़ी हुई जिल्दों की तरफ़ बढ़ जाता है।

शायद इसलिए कि वो मुझे जानती हैं या शायद इसलिए कि उनमें मैं खुद को हर बार थोड़ा अलग पाता हूँ।

हर बार वही पन्ने खोलता हूँ और हर बार कोई और शब्द मुझे रोक लेते हैं। कभी सोचता हूँ क्या ये शब्द पहले भी यहाँ थे? या तब मैं इन्हें देखने लायक समझ पर नहीं था। हर बार लगता है कि लेखक ने जो लिखा है क्या मैं सच में वही समझ रहा हूँ?



कभी-कभी लगता है कि हर अर्थ को पकड़ लेना ज़रूरी नहीं। कुछ बातों को अधूरा छोड़ देना भी अपने आप में एक समझ है।

लेकिन कुछ चीज़ें हैं जो छोड़ी ही नहीं जा सकतीं - किताबें और यात्राएँ…


यात्राएँ बाहर की कम अपने अंदर की ज़्यादा। हर सफ़र कहीं पहुँचाने से ज़्यादा मुझे थोड़ा और बेहतर बना देता है। जैसे मैं खुद को ही पढ़ रहा हूँ, हर्फ़ दर हर्फ़..


खैर, यात्रा जारी है, मेरे अंतरिक्ष में छूट जाने तक।

जहाँ शायद लिखने के लिए कुछ न बचे लेकिन महसूस करने को सब कुछ हो।

🌻


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