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चिट्ठी | मैं शून्य ही सही - राहुल अभुआ

बेहद मुश्किल होता है कि आपका लिखा लोगों को पसंद आने लगे, कुछ दिनों पहले पुणे में था तो मालूम चला की यहां घर पर एक पत्र आया है, आज समय मिला तो पढ़ा की एक शुभचिंतक हैं अभिजीत यादव जिन्होंने "मैं शून्य ही सही" में मेरी कोशिश की गई कुछ कविताओं पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
आपका आभार अभिजीत, ये पढ़कर बेहद अचंभित हूं और साथ साथ बेहद गौरवान्वित भी की इस अदने से इंसान की लेखनी आपको इतनी पसंद आई की आपने ऐसे चिट्ठी लिख मुझे अपना प्यार और आशीर्वाद भेजा दोस्त.. बयां कर पाने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास, बस जिस राह पर हूं उसमे आप जैसे पढ़ने-समझने और प्यार देने वाले दोस्त मिले तो जीवन सार्थक हो जाए.. सफर में हूं, मुलाक़ात होगी।
ईश्वर आपको खुश रखें..बेहद शुक्रिया आपका 🙏

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कहीं नहीं जाना है - लेख

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