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इंतज़ार (कहानी) – राहुल अभुआ


बाग हज़ारा बाग (लखनऊ) में बैठा साहिल इंतज़ार कर रहा था सबा के आने का, वो सबा के लिए झुमके और एक कत्थई रंग का दुपट्टा भी ले आया था।
"5 बजे पहुंचना था लेकिन हमेशा मैं इंतज़ार करवाता हूँ इसीलिए ये सबा की बच्ची मुझे जानबूझकर परेशान कर रही है, आने दो मैं बताता हूँ इसको" – साहिल ने घड़ी देखते हुए खुदसे कहा,
वो वहीं घूमते लोगों और हाथ में हाथ डाले प्रेमी जोडों को देखकर खुश हो रहा था, यूँ तो उसको प्रेमी जोडों का ऐसे हाथ में हाथ डालकर घूमना बड़ा अजीब लगता था, लेकिन इस वक़्त वो जोडों के प्यार और जज़्बात महसूस कर पा रहा था,
कुछ देर बीती थी की साहिल ने घड़ी की तरफ देखा और फिर दूर तक निगाह दौड़ायी लेकिन सबा का कोई नाम-ओ-निशान नहीं था। अब साहिल को बड़ा अजीब लगा, उसने चाहा की वो बाहर देख कर आये लेकिन उसे डर था की अगर वो बाहर गया और उस बीच सबा इधर आ गयी और वो उसे नहीं मिला तो फिर दिक्कत होगी। 
उन दोनों को किसी तरह आज ही बनारस के लिए निकलना था और कल शाम को निक़ाह के बाद अपनी ज़िन्दगी शुरू करनी थी। साहिल को ख़याल आने लगे की शायद सबा नहीं आयेगी
"सबा धोका नहीं दे सकती मुझे, उसी ने तो मुझे मनाया था शादी के लिये, ज़रूर कहीं ट्रैफिक में फँस गयी होगी" – साहिल ने अपने दिल को तसल्ली देते हुए कहा।
लेकिन 2 घण्टे बीत चुके थे और सबा नहीं आई। ग़ुस्से में साहिल वहां से निकलकर अमीनाबाद मार्किट से होते हुए सबा के मोहल्ले में पहुंचा, काफी देर टहलता रहा , सबा ने खिड़की नहीं खोली। इंतज़ार करकर साहिल गुस्से में वापस आ गया।
आज भी साहिल वहीं बाग हज़ारा बाग में खड़ा उस जगह को देख रहा है जहाँ 27 साल पहले वो सबा के इंतज़ार में झुमके और दुपट्टा लेकर सबा के आने का इंतज़ार कर रहा था। 
उसकी आँखों पर मोटे–ग्लास का चश्मा लग चुका है, चेहरे पर झुर्रिया पड़ चुकी है, आँखों में पानी है और बाल सफ़ेद होने लगे हैं। उसने घड़ी देखी लेकिन उसके हाथ में घड़ी नहीं है, घड़ी पहनने की आदत भी अब जा चुकी है, साहिल ने मोबाइल निकाला और उसमे टाइम देख। 10 बज चुके हैं, वो वहां से निकलता है और बैंक की तरफ जाता है।
साहिल अपनी एफ. डी. से जुड़े कुछ दस्तावेजों के लिए बैंक आया है।
"हेलो सर, आइये..माफ कीजियेगा कल सर्वर डाउन होने की वजह से काम नहीं हो पाया था' - कर्मचारी ने साहिल से कहा
'कोई बात नहीं, ये पेपर्स हैं, मैं ले आया हूं' - साहिल ने जवाब दिया
'जी, मैं फॉर्म भर देती हूँ आप यहाँ साइन कर दीजिए' - कर्मचारी ने साहिल से कहा
साहिल ने साइन किये और कुछ देर इंतज़ार करता रहा। वहां मैनेजर रूम से कोई  औरत साहिल को देख रही थी। उसने कर्मचारी से पूछते हुए कहा – "उन्हें क्यों इंतज़ार करवा रहे हैं?"
"मैम उनका काम हो गया बस, ये डाक्यूमेंट्स सबमिट करने थे, आपके सिग्नेचर चहिये" – कर्मचारी ने कहा
मैनेजर ने सिग्नेचर किये, कर्मचारी ने पेपर्स ले जाकर साहिल को दिए और साहिल जाने लगा।
शाम ढल चुकी थी, बरसात काफी तेज़ हो रही थी। साहिल अपने घर में बैठा नॉवेल पढ रहा था, पास ही रेडियो पर गीत बज रहे थे 
"आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे", 
साहिल हमेशा से लता मंगेशकर के गीतों का दीवाना रहा है। मौसम खुशनुमा है लेकिन साहिल की ज़िन्दगी में जैसे अजीब पशोपेश है, एक खालीपन से उसका मन हमेशा सुनसान रहा है इसलिए वो अपना ज़्यादातर वक़्त पढ़ने में निकालता है। 
थोड़ी देर बाद बारिश तेज़ हो गयी, उसके घर पर किसी ने डोर-बैल बजायी। 
"अरे इस वक़्त कौन है? ये ज़रूर इस्माइल होगा अखबार के पैसे के लिये, आ रहा हूँ भाई रुको ज़रा" - साहिल खुदसे बोलते हुए उठा और दरवाज़े की तरफ बढ़ा
"कौन हो भई" उसने कहते हुए दरवाज़ा खोला
सामने कोई औरत खड़ी थी, उसकी साड़ी भीग चुकी थी,
"जी कहिये" – साहिल ने उस औरत से बड़े अदब से पूछा
उसने कुछ जवाब नहीं दिया।
"जी कहिये क्या बात है?" – साहिल ने फिर से पूछा
गौर से देखने के बाद साहिल को वो चेहरा जाना-पहचाना सा मालूम हुआ लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई कुछ कहने की, वो गलत साबित नहीं होना चाहता था। 
वहां मानो एक अजीब सी शांति सी पसर गयी थी। लता मंगेशकर का वो गीत अब "जी मुझे मंज़ूर है आपका ये फैसला, 
कह रही है हर नज़र बंदा परवर शुक्रिया" 
तक पहुँच गया था, बारिश थोड़ी शांत होने को थी और रात मानो चाँदनी सी हो गयी थी,
"पहचान तक नहीं पा रहे हो साहिल" – उस औरत ने साहिल से कहा,
साहिल को अब यक़ीन हो गया था ये औरत और कोई नहीं सबा ही थी। आज अचानक 27 सालों बाद सबा को ऐसे सामने देखकर वो अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं कर पा रहा था।
"तुम... सबा?" – साहिल ने दबी आवाज़ में कहा
"हां, अंदर भी नहीं बुलाओगे" – सबा ने मुस्कुराते हुए उससे कहा
"हाँ... हाँ बिलकुल आओ ना..आओ आओ, वो बाहर गाडी तुम्हारी है?" – साहिल ने सबा को अंदर बुलाते हुए सवाल किया,
"हाँ, यहीं से गुज़र रही थी मैं"
"ठीक है, कोई दिक्कत नहीं घर के सामने है" 
सबा बैठक वाले कमरे की तरफ आती है, साहिल दूसरे कमरे में तौलिया लेने जाता है, वो वहीं रुक जाता है और उसको इस वाक़ये पर भरोसा नहीं हुआ है। वो वहीं से खड़ा सबा को देख रहा है। साहिल के मन में बहुत से सवाल हैं लेकिन उसकी हिम्मत नहीं कुछ और कहने की, वो हमेशा से ऐसा ही रहा है और इस खालीपन ने उसको और बदल दिया है। वो तौलिया लेकर आता है
"ये लो इससे सुखा लो" 
"क्या पढ रहे हो – आँगन?" – सबा ने तौलिया लेते हुए पूछा
"हाँ, ‘ख़दीजा मस्तूर’ ने लिखा है, वो ही  बस" – साहिल ने जवाब में कहा
"बदले नहीं हो बिलकुल भी, ऐसे वक़्त गुज़ारते हो अब भी?" – सबा ने कहा
"हाँ, बस वक़्त काटना होता है तो किताबो के सहारे निकल जाता है बस" – साहिल ने कहा,
रेडियो पर अगला गीत लता मंगेशकर की जगह गीता दत्त की आवाज़ में बज रहा था 
"वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम"
एक ख़ामोशी में ये बस गीत ही था जो मानो उन दोनों के दरमियान बातचीत कर रहा हो। साहिल के पास बहुत से सवाल थे जो वो अब पूछना नहीं चाहता था, और सबा की आँखों में बहुत सी बातें थी जो वो कह देना चाहती थी और मानो वो बस साहिल के पूछने का इंतज़ार ही कर रही थी। सबा कुछ कहने को हुई ही थी की साहिल ने टोक दिया
"चाय पियोगी?" 
ये कहता हुए साहिल रसोई की तरफ बढ़ा
"हां" – सबा ने हलकी आवाज़ में जवाब दिया।
साहिल रसोई में पहुंचकर चाय चढाने ही लगा था की सबा भी वहां आ गयी,
"तुम बैठो न, मैं बनाकर लाता हूँ चाय" – साहिल ने सबा से कहा,
"नहीं कोई बात नहीं, ठीक है" – सबा ने जवाब दिया
"तुम लखनऊ कब आई?" – साहिल ने सवाल किया
"बस 8 महीने पहले ही इधर बैंक में पोस्टिंग हुई, आज तुम्हे बैंक में देखा तो डिटेल्स से पता चला तुम ही हो" 
"तुम बैंक में थी?" – साहिल ने सवाल किया
"हाँ, वहीं तो तुम्हे देखा था। उसी ब्रांच में मैनेजर हूं, आखिरी साल है अब। मुझे लगा था तुम तो मुझे पहचानोगे ही नहीं और वैसा ही हुआ, खैर मैंने जो किया उसके बाद पह्चानना बनता भी नहीं था साहिल"
"नहीं, वो सब छोडो" – साहिल ने उसे टोकते हुए कहा
"कैसे छोडो साहिल? तुम यूँ चुप रहकर सज़ा देना चाहते हो मुझे? ऐसे?" – सबा ने झुंझलाते हुए साहिल से कहा
"क्या फायदा उस सबका अब? कुछ फायदा है? तुम खुश हो न, और मैं अपनी ज़िन्दगी में लगा हूं" – साहिल ने कहा
"क्य तुम खुश हो?" – सबा ने पूछा
"मेरी छोडो" – साहिल ने जवाब दिया
"मतलब तुम्हे कुछ नहीं कहना है मुझसे उस सबके बाद भी?" – सबा ने सवाल किया
"मैं क्या कहुंगा तुमसे सबा, यही की क्यों उस शाम तुम नहीं आई? की क्यों तुमने कुछ भी नहीं कहा और शादी कर ली? की क्यों तुम आज अचानक 27 सालों बाद मुझसे मिलने आयी हो? ये सब पूछूं मैं?" – साहिल ने जवाब में कहा,
"तुम हमेशा से ऐसे ही रहे हो साहिल, कुछ भी नहीं बदला है। इमोशन्स छुपाना, अपने में रहना ये सब आज भी वैसे का वैसा है तुममे" – सबा ने कहा,
"तो क्या चाहती हो तुम मुझसे? मैं जैसा था वैसा ही हूँ ये साल मैंने अकेले काटे हैं। शादी नहीं की, ज़िन्दगी आगे नहीं बढ़ायी, रुक गया वहीँ का वहीं, हाँ, इमोशन्स छुपाता हूँ इसलिए अटक गया उधर ही जहाँ सालो पहले छोड़कर चली गयी थी तुम" – साहिल ने कहा,
कुछ देर तक सबकुछ शांत रहा, बारिश थमने लगी थी, रेडियो पर गीत अभी भी बज रहा था। चाय डालते हुए साहिल ने देखा की सबा बैठक वाले कमरे में वापस जा चुकी थी। वो चाय लेकर वहां पहुंचा, दोनों ने बिना कुछ कहे चाय ली।
"मौसम है आशिक़ाना ऐ दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ लना" – अगला गीत रेडियो पर बजने लगा,
"अच्छी बनी है चाय" – सबा ने कहा और साहिल ने हल्की सी मुस्कान देते हुए उसे शुक्रिया कहा।
फिर कुछ देर की शान्ति को तोड़ते हुए साहिल ने कहा -
"और शौहर तुम्हारे वो भी यहीं हैं?"
"नहीं उनका इंतेक़ाल तो शादी के 4 महीने बाद ही एक हादसे में हो गया था" – सबा ने साहिल को बताया,
"क्या? ओह्ह्ह्ह...माफ करना" – साहिल ने चौंकते हुए कहा,
" कोई बात नहीं" – सबा ने कहा
"और फिर शादी?" साहिल ने पूछा,
"नहीं" सबा ने कहा
"और तुमने शादी नहीं की, पर क्यों?" – सबा ने चाय पीते हुए सवाल किया
"बस यूंही, रिश्तों से ऊब गया था, फिर दिल नहीं हुआ" – साहिल ने जवाब में कहा,
"वैसे भी तुमसे जो शादी करती उसको तुमसे पहले तुम्हारी ख़ामोशी से दोस्ती करनी पड़ती" – सबा ने हँसते हुए साहिल से कहा,
इस बात पर साहिल भी मुस्कुरा दिया और बोला – "हाँ, एक ये भी वजह थी"
काफी देर इधर उधर की बातें करते हुए खामोश हो जाने के सफ़र ज़ारी रहा, दोनों को कुछ समझ नहीं आया की क्या बातें करें, चाय ख़त्म करके सबा जाने के लिए उठी। 
दोनों चाहते थे की ये मुलाक़ात चलती रहे, ये बारिश न थमे, ये शाम न ढले लेकिन वक़्त को चलते रहना था और बारिश को थमने था। 
"बारिश रुक गयी शायद, ठीक है मैं चलती हूं" – सबा ये कहते हुए उठी और दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
साहिल भी उठकर दरवाज़े की तरफ आया, सबा बाहर निकली ही थी की उसने पलट कर कहा 
"अगर बुरा न मानो तो ऑफिस के बाद हर शाम आ सकती हूँ यहाँ?"
"हाँ...हाँ हाँ बिल्कुल, कभी भी" – साहिल ने कहा,
"ह्म्म, थैंक यू" – सबा ने मुस्कुरा कर कहा और गाड़ी की तरफ बढ़ी,
साहिल दरवाज़े पर खड़ा उसे जाते हुए देख रहा था। सबा गाड़ी में बैठी और निकल गयी। साहिल ने दरवाज़ा बंद किया,
रेडियो पर मुहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ में फिल्म ‘ताजमहल’ का गीत चल रहा था –
"सभी अहले दुनिया ये कहती है हमसे
के आता नहीं कोई मुल्क-ए-अदम से
आज ज़रा शान-इ-वफ़ा देखे ज़माना
तुमको आना पडेगा
जो वादा किया वो निभाना पडेगा..."

बस इतनी सी थी ये कहानी 

- राहुल अभुआ 'ज़फर' ✍️ 

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Comments

  1. Sir apki Kahani apne chennal par upload kar na chatahu

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