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प्रेम और क्रांति - Prem Aur Kranti | Poetry By Anu Roy | Hindi Kavita

 


प्रेम और क्रांति
मैं कविताएँ नहीं लिख सकता हूँ 
न ही मैं तुम्हारा ‘फ़राज़’ हो सकता हूँ 
मुझ से ग़ज़ल नहीं पढ़े जाते 
मैं मार्क्स को पढ़ता हूँ 
ख़ाली वक्त में विश्व की तमाम क्रांतियों के बारे में खोज-खोज जानकारी इकट्ठा करता हूँ
फिर तुम्हारा ख़्याल आता है,
“तुम रोमांटिक नहीं हो सकते”
कह कर मुँह बिचकाती तुम दिखती हो,
उस पल में मैं रोमांटिक होने की कल्पना करता हूँ 
लेकिन फिर भी मैं नहीं हो पाता तुम्हारी फ़ेवरेट सीरीज़ “You” का ‘जो’
मैं नहीं सज़ा पाता फूलों वाले सपने
तारों की छाँव में हम बैठें हों ऐसा कुछ,
हाँ मैं देख पाता हूँ 
एक घर, जहां हर चीज़ तुम्हारी पसंद की है 
कुछ एक मेरी पसंद की भी हैं,
बड़ी सी लाइब्रेरी में ख़ूब सारी किताबें
उन किताबों पर तुम्हारा नाम,
तुम्हारी लिखीं किताबें 
मेरी सफ़ेद शर्ट में तुम
तुम्हारे उलझे बालों में फँसा मैं
तुम लिखती हुई कहीं फँस गयी हो 
मुझे तुम समझा रही हो अपनी कहानी का प्लॉट 
और मैं सिर्फ़ देख पा रहा हूँ तुम्हारे हिलते होंठों को,
कान से निकल कर गालों को छू कर ग़ुस्ताख़ होते तुम्हारे कुछ बालों को,
उस सफ़ेद शर्ट से टूट कर गिरने वाली एक बटन को 
तुम्हारी गर्दन वाली तिल को 
और लैप्टॉप पर टाइप हुए काले मोतियों को 
तुम झुँझला कर बोलती हो,
“कुछ समझ आ रहा है तुम्हें”
मैं तुम्हारे चिढ़े होंठों को चूम कर कहता हूँ,
“I got you babe”
फिर तुम्हारे लिए चाय बनाने किचन में आ जाता हूँ 
वहाँ मैं सोचता हूँ तुम्हारे लिए 
तुम्हारी कहानी को 
और याद आने लगती हैं विश्व की तमाम क्रांतियाँ 
जिनमें तुम योद्धा हो 
तुम ही विजेता हो,
मेरे लिए तुम्हारे साथ प्रेम में होना 
दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति है
- अनु रॉय 

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